Dr Shafali Garg

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ज्योतिष” भाग्य नहीं बदलता बल्कि कर्म पथ बताता है, और सही कर्म से भाग्य को बदला जा सकता है इसमें कोई संदेह नहीं है।

🌹 वैदिक ज्योतिष में मानसिक रोग ( डिप्रेशन) के ज्योतिषीय कारण और उपाय।🌹

आज के तेजी से बढ़ते समय में सभी को बहुत सी परेशानियों का सामना करना पढ़ता हैं। जिसमें कुछ लोग तो इससे लड़ जाते हैं और कुछ लोग बहुत ही जल्दी नकारात्मकता के शिकार हो कर अवसाद (ड़िप्रेशन) या मनोरोग के शिकार हो जाते हैं।इस आर्टिकल में हम समझेंगे की ज्योतिष से हम कैसे समझ सकते हैं कि यह जातक डिप्रेशन का शिकार है।

ज्यादातर महिलाओं का मन कमज़ोर होने पर वह इस बीमारी का शिकार जल्दी हो जाती हैं क्योंकि जो महिलायें घर में रहती हैं और अपने मन की बात किसी से खुल कर नहीं कर पाती हैं वह बहुत जल्दी ड़िप्रेशन का शिकार हो जाती हैं। अधिकतर लोगों को यही कहते सुना हैं कि जिंदगी में सब कुछ हैं, परंतु सुकून नहीं हैं, जिसका कारण यही अवसाद और ग्रहों का कमज़ोर होना हैं।कुछ लोग तो इस तरह की मनस्थिति में होते हैं , की बहुत जल्दी बातों को दिल में लगा लेते हैं।  परेशान हो जाते हैं।  ऐसा लगता है कि जैसे उन्हें घुटन महसूस हो रही हो , और यही “नकारात्मक सोच” के कारण वह अवसाद में आते हैं या कहें डिप्रेशन में आते हैं।

वैदिक ज्योतिष में जन्म समय के आधार पर कुंडली बनाई जाती है जिसमें नौ ग्रहों और 12 भावों के आधार पर हम यह समझ सकते हैं, कि जातक  किस योग के कारण इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं।

चन्द्रमा: चन्द्रमा मन का कारक हैं इसका कमज़ोर या मज़बूत होना किसी की मानसिक अवस्था को प्रतिबिम्बित करता हैं। यह दुसरों के प्रति अनुराग, भावनायें, भावनात्मक, प्रेम, प्रतिक्रियायें, मानसिक योग्यता आदि का सूचक हैं और इस प्रकार की बाते किसी गणितीय तर्क पर नहीं चलती हैं। चन्द्रमा का कोई ग्रह शत्रु नहीं हैं फिर भी कुछ ग्रहों के प्रभाव से यह बहुत नकारात्मक हो जाता हैं।

बुध: बुध नसों, नाड़ी मंड़ल, शिक्षा, मानसिक स्थिति, ज्ञान, शक्ति एवं व्यवहार की समझ तथा जटिलताओं को दर्शाता हैं। बुध ग्रह शत्रु मानता हैं चन्द्रमा को। मन यानि चन्द्रमा का विवेक एवं ज्ञान यानि बुध से गहरा योगी-प्रतियोगी सम्बन्ध हैं।  

गुरु: गुरु ज्योतिष में सबसे शुभ ग्रह हैं क्योंकि गुरु विचारों में ज्ञान, परिपक़्वता एवं बुद्धिमता का कारक हैं। गुरु ग्रह बुध के लिए सम हैं परन्तु बुध गुरु का शत्रु हैं। यहां ये स्पष्ट हैं की तर्क की कठोर सीमायें बुद्धिमता के प्रयोग को रोक सकती हैं। जब चन्द्रमा बुध और गुरु बलि हो व अच्छी स्थिति में हो तो जातक का मस्तिष्क/मन पुष्ट होता हैं उसके पास विवेक तथा बुद्धिमता होती हैं। जब इन तीन ग्रहों पर पाप प्रभाव, दुर्बल या अशुभ स्थिति में हो तो मानसिक बीमारी, नाड़ियों की दुर्बलता, भ्रमित बुद्धि तथा विवेकपूर्ण निर्णय लेने तथा उन पर अमल करने की अयोग्यता होती हैं।

जिस तरह हमने समझा कि अवसाद या डिप्रेशन को ऊपर दिए ग्रहों के योगदान से, ठीक इसी प्रकार कुंडली में 12 भावों का भी उतना ही महत्व है

पंचम भाव: वैदिक ज्योतिष में यह भाव कल्पना शक्ति, मानसिक ऊर्जा, चिंतन, तर्क तथा बुद्धिमता का हैं। अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए पंचम/पंचमेश पीड़ित न होकर शुभ प्रभावों में होने चाहिए।

लग्न तथा मेष राशि: कालपुरुष कुंड़ली में मेष राशि का प्रथम भाव होने के कारण यह सिर हैं। जिससे लग्न को प्रथम भाव यानी जातक का सिर मानते हैं। अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिए दोनों शुभ स्थिति में होने चाहिए।

शुभाशुभ योग: इन तथ्यों के अतिरिक्त कुंड़ली में कुछ विशेष शुभाशुभ योग होते हैं जो मानसिक रोग को बढ़ावा देते हैं अथवा उसे रोकते हैं। जिनमें ये योग विशेष महत्वपूर्ण हैं।

केमद्रुम योग: जब चन्द्रमा के साथ या दूसरे अथवा द्वादश भाव या चन्द्रमा से केंद्र में कोई ग्रह न हो। यह एक प्रतिकूल योग हैं क्योंकि स्वस्थ मन के लिए चन्द्रमा को सम्बल की आवश्यकता होती हैं। जब चन्द्रमा से दूसरे तथा बारहंवे स्थान में कोई ग्रह न हो तो यह कुंड़ली में मानसिक दुर्बलता का सूचक हैं।

चन्द्राधि योग: चन्द्रमा से छठे, सातवें, आठवें स्थान में ग्रह हो तो चन्द्राधि योग होता हैं। इन भावो में शुभ ग्रह चन्द्रमा की शक्ति में वृद्धि करते हैं तथा पाप ग्रह वृद्धि में बाधा ड़ालते हैं।

चन्द्रमा पर पाप प्रभाव:
प्राय: चन्द्रमा के पीड़ित होने से मानसिक असंतुलन होता हैं। ये साधारण मतिभ्रम से लेकर न्यूरोसाइकोटिक ड़िसऑर्डर देता हैं। चन्द्रमा तभी पीड़ित होता हैं जब वह दुर्बल हो, छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो या पाप ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो।

कुछ ग्रहों के प्रभाव से चन्द्रमा का फल बदल जाता हैं। जैसे:-

सूर्य के ही प्रभाव के कारण तीक्ष्ण स्वभाव हो सकता है, झगड़ालू प्रवृत्ति हो सकती है , स्वयं ही तर्क देने के लिए जातक तैयार रहता है।

मंगल के प्रभाव से तीक्ष्ण स्वभाव, आक्रमण व हिंसक होता हैं। इससे मानसिक आघात लगने की सम्भावना भी रहती हैं।

शनि के प्रभाव के कारण डिप्रेशन होना, या तीव्र अवसाद होना, सनकपन होना, मानसिक रोग, उदासी , पागलपन और नकारात्मकता की भावना होती है।

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